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गोपीमोहन साहा का जन्म बंगाल की धरती की गोद में हुआ था। उनके माता पिता कलकत्ते में रहते थे। कलकत्ते में ही उनकी बाल्यावस्था व्यतीत हुई थी और कलकत्ते में ही उनकी शिक्षा-दीक्षा भी हुई थी। जिस मनुष्य के हृदय में अपने देश के लिए प्रेम नहीं होता, उसका हृदय पाषाण की भांति होता है। इसी बात को बंगला के एक प्रसिद्ध कवि ने अपनी एक कविता में इस तरह लिखा है- जिस मनुष्य के हृदय में देश का प्रेम जागृत नहीं होता, वह मनुष्य मनुष्य होते हुए पशु के समान होता है। साहा ने इन दोनों कविताओं के विरुद्ध हृदय पाया था, अनमोल हृदय पाया था ऐसा हृदय पाया था, जिसमें देश के प्रेम का सागर उमड़ा करता था। बड़े-बड़े देशप्रेमी भी उनके देशप्रेम की प्रशंसा किया करते थे। साहा क्रान्तिकारी थे। उनका अहिंसा में नहीं, हिंसा में विश्वास था। वे दिन में तो बड़ी कर्मठता के साथ अपने रास्ते पर चलते ही रहते थे, रात में निद्रावस्था में भी रह-रह कर चिल्ला उठते थे- मैंने उस अंग्रेज की हत्या की। जब तक मैं अंग्रेजी शासन को मिटा नहीं दूंगा, संतोष की सांस नहीं लूंगा। साहा की निद्रावस्था की इन बातों को जो भी सुनता था, वह उन्हें उन्मत्त समझे बिना नहीं रहता था, किन्तु क्या वे उन्मत्त थे? नहीं, उनके मन में देश की स्वतंत्रता के अतिरिक्त और कुछ था ही नहीं। वे खाते पीते, सोते-जागते निरंतर स्वतंत्रता के ही ध्यान में डूबे रहते। साहा बाल्यावस्था में ही बड़े निर्भीक स्वभाव के थे। वे किसी से भी डरते नहीं थे। निशाना भी खूब साधते थे। उनका निशाना अचूक होता था। वे बाल्यावस्था में ही देशभक्तों और क्रान्तिकारियों की कहानियों को प्रेम से पढ़ा करते थे। साहा को अपने जीवन में देश के अतिरिक्त और किसी अन्य कार्य को करने का अवसर नहीं मिला। इसका कारण यह था कि किशोर वय में ही वे फांसी के तख्ते पर चढ़ गये थे। कहा जा सकता है कि उनका जन्म देश की स्वतंत्रता के लिए, फांसी के तख्ते पर चढ़ने के लिए ही हुआ था।
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Episode Details
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- Radio Azad
- Show Type
- full
- Audio Format
- audio/mpeg
