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१८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की विफलता के बाद में ब्रिटिश सरकार ने सत्ता पर सीधा नियंत्रण कर एक ओर उत्पीड़न तो दूसरी ओर भारत में औपनिवेशिक व्यवस्था का निर्माण शुरू किया। क्योंकि खुद ब्रिटेन में लोकतांत्रिक व्यवस्था थी, इसलिए म्युनिसपैलिटी आदि संस्थाओं का निर्माण भी किया गया, लेकिन भारत का आर्थिक दोहन अधिक से अधिक हो, इसलिए यहां के देशी उद्योगों को नष्ट करके यहां से कच्चा माल इंग्लैंड भेजा जाना शुरू किया गया। साथ ही पूरे देश में रेलवे का जाल बिछाया जाना शुरू हुआ। ब्रिटिश सरकार ने भारत के सामंतों को अपना सहयोगी बना कर किसानों का भयानक उत्पीड़न शुरू किया। नतीजतन उन्नीसवीं सदी के अंत तक आते-आते देश के अनेक भागों में छिटपुट विद्रोह होने लगे। महाराष्ट्र और बंगाल तो इसके केंद्र बने ही, पंजाब में भी किसानों की दशा पूरी तरह खराब होने लगी। परिणामतः बीसवीं सदी के आरंभ में ही पंजाब के किसान कनाडा, अमेरिका की ओर मज़दूरी की तलाश में देश से बाहर जाने लगे। मध्यवर्गीय छात्र भी शिक्षा-प्राप्ति हेतु इंग्लैंड, अमेरिका वे यूरोप के देशों में जाने लगे थे। अमेरिका और कनाडा में भारत से काम की तलाश में सबसे पहले १८९५ और १९०० के बीच कुछ लोग पहुंचे। १८९७ में कुछ सिख सैनिक इंग्लैंड में डायमंड जुबली में हिस्सा लेने आए और लौटते हुए कनाडा से गुज़रे। उनमें से कुछ वहीं रुक गए, लेकिन ज़्यादातर पंजाबी मलाया, फिलीपींस, हांगकांग, शंघाई, फिज़ी, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड आदि देशों से सबसे पहले कनाडा और अमेरिका पहुंचे। १९०५ में कनाडा पहुंचने वाले भारतीयों की संख्या सिर्फ ४५ थी, जो १९०८ में बढ़ कर २०२३ तक पहुंच गई। एक विद्वान् के अनुसार १९०७ में वहाँ ६००० तक भारतीय पहुंच चुके थे। इनमें से ८० प्रतिशत पंजाबी-सिख किसान थे। १९०९ में कनाडा में प्रवेश के कानून कड़े कर दिए जाने पर भारतीयों का रुख अमेरिका की ओर हुआ, जहां पर १९१३ में भारतीयों की संख्या एक अनुमान के अनुसार पांच हज़ार थी, हालांकि डॉ॰ राम मनोहर लोहिया अपनी पुस्तक ‘Indian in Foreign Lands’ में इनकी संख्या १५००० बताते हैं। इन भारतीयों में ९० प्रतिशत पंजाबी-सिख किसान थे, कुछ मध्यवर्गीय विद्यार्थी थे। कनाडा और अमेरिका पहुंचे पढ़े-लिखे भारतीयों ने शीघ्र ही वहां से भारतीय स्वतंत्रता की मांग उठाने वाली पत्र-पत्रिकाएं निकालनी शुरू कीं। तारकनाथ दास ने Free Hindustan पहले कनाडा से पत्र निकाला तो बाद में अमेरिका से। गुरुदत्त कुमार ने कनाडा में ‘यूनाइटेड इंडिया लीग’ बनाई और ‘स्वदेश सेवक’ पत्रिका भी निकाली। कनाडा और अमेरिका के अतिरिक्त इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, जापान व अन्य अनेक देशों में पहुंचे भारतीयों ने स्वतंत्रता की अलख जगाई। भारत से बाहर जाकर भारतीय स्वतंत्रता के लिए आंदोलन करने वाले भारतीयों में सबसे पहला चर्चित नाम श्यामजी कृष्ण वर्मा का है, जिन्होंने पहले इंग्लैंड और उसके बाद पेरिस से स्वतंत्रता का बिगुल बजाया। इंग्लैंड से शुरू हुआ ‘इंडियन सोश्योलोजिस्ट’ अंग्रेज़ों की कोपदृष्टि का शिकार होकर पेरिस पहुंचा और वहां से भारत और दूसरी जगहों पर पहुंचता रहा। पेरिस में श्यामजी कृष्ण वर्मा के साथ-साथ सरदार सिंह राणा और मदाम भीकाजी कामा बहुत सक्रिय रहीं। १९०७ के स्टुगार्ड में हुए समाजवादी सम्मेलन में भीकाजी कामा ने ही पहली बार भारत का झंडा फहराया। जर्मनी में वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय, जो ‘चट्टो’ के नाम से चर्चित थे और चंपक रमण पिल्लै सक्रिय थे। इन्हीं के साथ स्वामी विवेकानंद के छोटे भाई डॉ॰ भूपेन्द्रनाथ दत्त भी सक्रिय रहे। १९०६ में इंग्लैंड पहुंचे विनायक दामोदर सावरकर ने ‘अभिनव भारत’ व ‘फ्री इंडिया सोसायटी’ बनाई। उन्हीं से प्रेरित होकर पंजाब से पहुंचे मदनलाल ढींगरा ने १९०९ में कर्ज़न वायली की हत्या कर दी, जिसके कारण उन्हें डेढ़ महीने के भीतर ही लंदन में फांसी दे दी गई। भारत से बाहर भारत की आज़ादी के लिए फांसी पर चढ़ कर शहीद होने वाले वे शायद पहले भारतीय थे। इसके ३१ साल बाद एक और पंजाबी देशभक्त उधम सिंह ने जलियांवाला बाग के कुख्यात खलनायक ओडवायर की हत्या कर १९४० में लंदन में ही फिर शहादत हासिल की थी। इस बीच ईरान में सूफी अंबा प्रसाद और कनाडा में भाई मेवा सिंह शहीद हुए। भूमिका १६ नवम्बर १९१५ को साढे़ उन्नीस साल के युवक कर्तार सिंह सराभा को उनके छह अन्य साथियों - बख्शीश सिंह, (ज़िला अमृतसर); हरनाम सिंह, (ज़िला स्यालकोट); जगत सिंह, (ज़िला लाहौर); सुरैण सिंह व सुरैण, दोनों (ज़िला अमृतसर) व विष्णु गणेश पिंगले, (ज़िला पूना महाराष्ट्र)- के साथ लाहौर जेल में फांसी पर चढ़ा कर शहीद कर दिया गया। इनमें से ज़िला अमृतसर के तीनों शहीद एक ही गांव गिलवाली से संबंधित थे। इन शहीदों व इनके अन्य साथियों ने भारत पर काबिज़ ब्रिटिश उपनिवेशवाद
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Episode Details
- Author
- Radio Azad
- Show Type
- full
- Audio Format
- audio/x-m4a
