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ग्वालियर राज्य के राजकोष गंगाजली के प्रधान कोषाध्यक्ष अमरचंद जैन बांठिया बड़े धर्मनिष्ठ व कर्तव्यपरायण थे। तब सिंधिया नरेश मोती वाले राजा के नाम से जाने जाते थे। विपुल धनराशि से भरी गंगाजली पर कड़ा पहरा रहता था। उस समय यह चलन था कि गंगाजली को कोई राजा न देख सकता था, न उसमें से कुछ निकाल सकता था। उसमें सदैव वृद्धि होती रहती थी। उसे केवल कोषाध्यक्ष ही जानते थे। उधर 1857 की क्रांति के समय महारानी लक्ष्मीबाई अपने सेनानायक राव साहब, तात्या टोपे और रानी बैजाबाई के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध भयंकर युद्ध लड़ रही थीं। लेकिन उनके सैनिकों को कई माह से वेतन नहीं मिला था, राशन के लाले पड़ गए, स्थिति दयनीय थी। यह जानकर अमरचंद का देशभक्त हृदय फड़फड़ाने लगा। उन्होंने एक मुनि का प्रवचन भी सुना कि जो दूसरों के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दे, उसी का जन्म सार्थक है। इस पर उन्होंने सैनिकों की मदद का संकल्प कर लक्ष्मीबाई के संकेत पर 5 जून 1858 को गुप्त रूप से राव साहब को कोषागार का निरीक्षण कराकर अगले दिन सुबह ही विपुल धनराशि उन्हें सौंप दी, जिससे क्रांतिकारी सैनिकों को 5-5 माह का वेतन दिया गया। संकटग्रस्त फौज ने बुलंद हौसलों से अंग्रेजी सेना के दांत खट्टे कर ग्वालियर पर कब्जा कर लिया। लेकिन 16-17 जून को ह्यूरोज और ब्रिगेडियर स्मिथ ने भयंकर हमला किया, जिसमें लक्ष्मीबाई अनेक फिरंगियों को मौत के घाट उतारकर वीरगति को प्राप्त हो गईं। उसके 4 दिन बाद ही 22 जून 1858 को ब्रिगेडियर नैपियर ने राजद्रोह के आरोप में अमरचंद बांठिया को पकड़कर ग्वालियर के सर्राफा बाजार में नीम के पेड़ पर लटकाकर फांसी पर चढ़ा दिया। दहशत फैलाने के लिए तीन दिन तक शव को पेड़ पर ही लटकाए रखा गया। वह नीम का पेड़ आज भी उस शहीद की गौरव गाथा सुना रहा है।
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Episode Details
- Author
- Radio Azad
- Show Type
- full
- Audio Format
- audio/mpeg
